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चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Last Modified: 12 Jun 2012 10:07:24 AM IST

भाजपा को खोखला करते पांच प्रमुख कारण

आशीष महर्षि

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कलह की शिकार पार्टी में इस वक़्त टांगखीच प्रतिस्पर्धा चालू है. क्या पितामह और क्या नई पीढ़ी (Photo- Panini Anand)

संजय जोशी और नरेंद्र मोदी का विवाद हो या फिर भाजपा के नेताओं का आए दिन बागी तेवर दिखाना, सभी पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं. यह कोई पहला मामला नहीं है जब भाजपा की कलह सामने आई है. तीस साल पुरानी यह पार्टी राजनीति के लिए विवादों के लिए अधिक जानी जाती है. भाजपा में कई नेताओं का कद पार्टी से बड़ा है तो कई प्रधानमंत्री पद के सीधे दावेदार. आइए जानते हैं कि कौन कौन सी कमियों और खामियों के कारण भाजपा को सत्ता से दूर रहना पड़ सकता है. 

 
पार्टी से बड़े हुए नेताओं के कद
 
भाजपा की सबसे बड़ी कमी यही है कि पार्टी में कई नेता संगठन से बड़े हो जाते हैं. उप्र में कल्याण सिंह, राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया, कर्नाटक में येदुरप्पा हो या फिर गुजरात में नरेंद्र मोदी. इन सभी नेताओं ने कई बार खुद को पार्टी से ऊपर माना है. जिसके कारण पूरे देश में भाजपा की किरकिरी हुई है. पार्टी ने भले ही अधिकांश नेताओं को समझा बुझाकर या उनकी नाजायज मांगों के आगे झुक कर भाजपा को बचा लिया हो लेकिन मोदी के मामले में ऐसा नहीं है. मोदी जो चाहते हैं, वह होता है. चाहे कार्यकारिणी की बैठकों से नदारद रहने की बात हो या फिर अपनी पार्टी में अपने विरोधियों को ठिकाने लगाना हो, मोदी हमेशा विजयी रहते हैं. 
 
संघ की कमजोर पकड़
 
भाजपा की मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दिनोंदिन पार्टी में पकड़ कमजोर होती जा रही है. भाजपा में हमेशा से ही संघ का दबदबा रहा है. चाहे चुनाव के दौरान उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया हो या फिर भाजपा के शीर्ष नेता को बदलने की बात, हर चीज संघ ही तय करता है. लेकिन पिछले कुछ वक्त से नरेंद्र मोदी पर संघ की कोई पकड़ नहीं रही. मोदी सरेआम अपनी बात मनवाते रहे और संघ कुछ भी नहीं कर पा रहा है. भाजपा के अधिकांश  वरिष्ठ नेताओं के विरोध और संघ के विरोध के बावजूद शीर्ष नेता को मोदी के आगे झुकते हुए संजय जोशी की बलि लेनी पड़ी. 
 
 
प्रधानमंत्री के कई दावेदार 
 
लोकसभा चुनाव में भले ही दो साल बचे हों लेकिन भाजपा में प्रधानमंत्री पद के उम्म्मीदवारों की कोई कमी नहीं है. पिछले चुनाव में पीएम इन वेटिंग के खिताब से नवाजे गए लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नरेंद्र मोदी तक इस कतार में खड़े हैं. इनके अलावा अरुण जेटली, सुषमा स्वराज जैसे नेता भी इस कतार में हैं. कई मौकों पर इन नेताओं की महत्वाकांक्षा खुलकर भी सामने आ जाती है. 

बागियों की नहीं है कमी
 
भाजपा में जितने बागी नेता हैं, शायद आज की तारीख में किसी और दल में होंगे. ये नेता जब चाहें  तब शीर्ष नेतृत्व का कान मरोड़ सकते हैं. हर बार भाजपा को ही इनके आगे झुकना ही पड़ता है. चाहे वह येदुरप्पा हों, वसुंधरा हों या फिर उमा भारती. इन नेताओं ने मौके बे मौके पर पार्टी की परेशानी बढ़ाई ही है. फिलहाल इस लिस्ट में सबसे ऊपर नरेंद्र मोदी हैं. 
 
मूल मुद्दे से भटकाव
 
तीन दशक पुरानी पार्टी हिंदुत्व के मुद्दे पर ही दिल्ली तक पहुंच पाई थी. लेकिन सत्ता में आने के बाद पार्टी ने राम मंदिर और हिंदुत्व जैसे मुद्दे को दरकिनार कर दिया. जिसके कारण उसे कई चुनाव में हार का सामना देखना पड़ा. भाजपा भले ही विकास की राजनीति को बढ़ावा देने की बात करती हो लेकिन उसके वोटर आज भी पार्टी को पुराने रूप में देखना चाहती है. जिसमें राम मंदिर का मुद्दा सबसे बड़ा है. 
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— Written by Deepak Mishra, “about 11 months, 5 days, 55 minutes, 33 seconds ago

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