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निसार मैं तेरी गलियों के, ऐ वतन, के जहाँ
चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Last Modified: 26 Dec 2011 01:24:16 PM IST

गज़ल को जनता की आवाज बनाया अदम गोंडवी ने

प्रतिरोध ब्यूरो

adam gondvi hindi poet
जन संस्कृति मंच, दिल्ली के कार्यक्रम में कई कवियों, साहित्यकारों ने अदम गोंडवी को याद किया

जन शायर अदम गोंडवी और उनका कलाम आम जनता में जिंदा रहा और हमेशा रहेगा. यह उस फकीराना शायर की ताकत थी और इसीलिए उनका मकाम बिल्कुल अलग है- यह कहना था आज के दौर के मशहूर रचनाकार गौहर रजा का.

 
अदम गोडंवी की याद में जन संस्कृति मंच, दिल्ली द्वारा आयोजित सभा में गौहर ने कहा कि अदम ने अपने कलाम से हिंदी शायरी को हिला कर रख दिया. जो बिंब-जो पथरीली जमीं अदम ने गज़लों में इस्तेमाल की, वह उर्दू में भी देखने को नहीं मिलती. अदम के साथ अपनी सघन मुलाकातो को याद करते हुए गौहर ने कहा कि उन्हें भूल जाना मुमकिन नहीं क्योंकि वह फकीर शायद सृजनात्मकता के मिराज थे. कार्यक्रम में अदम की कई रचनाओं का पाठ भी विभिन् न संस्कृतिकर्मियों ने किया. कार्यक्रम का संचालन भाषा सिंह ने किया.
 
कार्य़क्रम की शुरुआत में युवा रचनाकार मुकुल सरल ने अदम गोंडवी संक्षिप्त जीवन परिचय दिया औऱ दो मिनट का मौन रखा गया. वरिष्ठ कवि व लेखक अजय सिंह ने विस्तार में बताया कि अदम गोंडवी की पहली कविता, चमारों की गली में ले चलुंगा आपको—से बिल्कुल खलबली मच गई थी. अजय सिंह ने बताया कि किस तरह से वामपंथी प्रतिबद्धता को अदम ने रचनाओं के जरिए नया मुकाम तक पहुंचाया. अजय सिंह ने अदम गोंडवी की इस प्रसिद्ध गज़ल-सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं...कि तुलना कुछ साल पहले आई अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता समिति की उस रिपोर्ट से की जिसमें कहा गया था कि देश की सत्तर फीसदी आबादी 20 रुपये रोज से कम में जिंदा है. उन्होंने बताया कि अदम की रचनाओं ने उत्तर प्रदेश में वामपंथी जमीन को तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान किया. अजय सिंह ने बताया कि अदम का जुड़ाव भाकपा माले से जुडे इंडियन पीपुल्स फ्रंट, पहचान सांस्कृतिक संगठन और आखिर में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे.
 
वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि अदम गोंडवी सीधे ललकारते थे, जैसे नागार्जुन. वह दूसरे दुष्यंत नहीं बल्कि नागार्जुन की तरह आम आदमी से जुड़े, उसी में बसने वाले रचनाकार थे. मंगलेश डबराल ने कहा कि आज उनकी रचनाओं को एक साथ प्रकाशित करने की जरूरी है. 
 
डॉ. एके अरूण ने कहा अदम की शायरी की जनपक्षधर शायरी को विरला बताते हुए इस बात पर जोर दिया कि ऐसे संकट से गुजर रहे रचनाकारों की मदद के लिए एक कोष बनाया जाना चाहिए. कवि औऱ महिला कार्यकर्ता शोभा सिंह ने याद किया कि किस तरह से अदम जनसंघर्षों के अभिन् न साथी थे औऱ उनकी शायरी से बल मिलता था. उन्होंने अदम की गजल –सौ में सत्तर आदमी का पाठ भी किया. 
 
इस मौके पर वरिष्ठ कवि त्रिनेत्र जोशी, मदन कश्यप, वरिष्ठ कथाकार पंकज बिष्ट, संस्कृतिकर्मी संजीव उपाध्याय, पाणिनि आनंद आदि ने भी शिरकत की. कार्यक्रम में अदम की चमारों की गली तक ले चलो, न महलों की बुलंदी से न लफ्जो के नगीने से, भूख के एहसास को शेरो सुखन तक ले चलो, जो उलझ कर रह गई फाइलों के जाल में आदि रचनाओं का पाठ भी किया गया.
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