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निसार मैं तेरी गलियों के, ऐ वतन, के जहाँ
चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Last Modified: 01 May 2012 12:20:31 AM IST

हम लड़ेंगे साथी- मजदूर दिवस पर विशेष

प्रतिरोध ब्यूरो

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पाश की एक कविता, जो मजदूरों के आखिरी संघर्ष तक हौसला देने का काम करती रहेगी

पाश की हर कविता समाज के सच को उघाड़कर उल्फ नंगा खड़ा कर देती है बाकी की चमकदार चालों के अस्तबल में. पाश का लिखा तस्वीरों की तरह है जो अपने दौर के सच को लोगों के सामने हूबहू लाती चलती हैं.

 

पाश की ऐसी ही एक कविता को कॉमरेड राशिद ने अपनी आवाज़ में गाया है. कुछ तस्वीरों का कोलाज है जिसके साथ इसे यू-ट्यूब पर अपलोड कर दिया गया है.

 

मजदूर दिवस के मौके पर मुझे लगता है कि इस गीत को ज़रूर सुनना चाहिए. क्योंकि इसी गीत में वो हौसला सांस लेता है जिसके दम पर हम बराबरी और ईमानदारी के लिए सदियों से संघर्ष करते आ रहे हैं. इस आस में कि वो सुबह कभी तो आएगी.

 

पर सुबह आने तक लड़ना होगा. हम लड़ेंगे साथी.

 

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Hum ladenge, yakeenan!

— Written by Suhasini, “about 1 year, 8 days, 22 hours, 7 seconds ago

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