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निसार मैं तेरी गलियों के, ऐ वतन, के जहाँ
चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Last Modified: 20 Jan 2012 09:45:13 AM IST

हुकूमते हिंदुस्तान बनाम हाकिम सेन

प्रतिरोध ब्यूरो

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दास्तान सुनाते दानिश हुसैन और महमूद फ़ारूक़ी

डॉक्टर बिनायक सेन के मामले से आप में से अधिकतर वाकिफ होंगे. किस तरह एक चिकित्सक और मानवाधिकार कार्यकर्ता को राजसत्ता सताती है, उसे बदनाम करती है, उसपर राजद्रोह का मुक़दमा कायम करती है.

 
डॉक्टर बिनायक सेन का मामला अकेला मामला नहीं है और न ही उनकी ज़मानत के बाद सैकड़ों और लोगों को, जो बेगुनाह हैं लेकिन राजद्रोह जैसे अभयोगों के तहत जेलों में प्रताड़ित किए जा रहे हैं, को रिहाई मिल गई है.
 
दास्तानगोई एक तरह की मंच कला है, एक ख़ास अंदाज़ में किस्सों को सुनाने का तरीका है. इसमें अय्यारों की कहानियां, तिलिस्मों के गलियारे होते हैं और एक अलग किस्म की दुनिया में हम चीज़ों को बनता-बिगड़ता महसूस करते हैं, इस ज़रिए मनोरंजन करते हैं.
 
जनाब महमूद फ़ारूकी और दानिश हुसैन ने इसी कला के ज़रिए कई अहम मसलों और समसामयिक सवालों से लोगों को जोड़ा है. सवालों और सच्चाइयों को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की है.
 
इसी में से एक है दास्तान-ए-राजद्रोहः हुकूमत-ए-हिंदोस्तां बनाम हाकिम (बिनायक) सेन.
 
सुनिए इस प्रस्तुति का ऑडियो.
 
 
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